जवाहर लाल नेहरू मार्ग, सन्निधि, राजघाट, नई दिल्ली-110002
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
जब गांधीजी 1915 में साउथ अफ्रीका से भारत लौटे, तो उन्होंने यह महसूस किया कि देश में राष्ट्रीय एकता बहुत आवश्यक है।
भारत को पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य हासिल करना था। विभिन्न सम्प्रदायों के लोगों की परस्पर समझ, अनेक समुदायों की हार्दिक एकता, जातियों और संस्कृतियों का एक साथ व्यापक समन्वय हो सके इसलिए गांधी के कार्यों का पहला लक्ष्य भारतीय दृष्टि से राष्ट्र का पुनर्निर्माण था। गांधीजी ने उसके लिए ‘रचनात्मक कार्यक्रम का प्रारूप तैयार किया। जिनमें सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक विषयों के साथ राष्ट्रीय भाषा नीतिभी प्रस्तुत की जिसके अनुसार प्रांतीय भाषाओं के सशक्तिकरण के साथ राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रुपमें हिन्दी-हिन्दुस्तानी भाषा के संवर्घन एवं प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया गया था।
उन्होंने वर्ष 1942 में उपर्युक्त उद्देश्य की पूर्ति के लिए ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’, वर्धा की स्थापना की। उन्होंने इस कार्य के लिए काका साहेब कालेलकर कोचुना। काकासाहेब ने इसी उद्देश्य को व्यापक रुप देने के लिए 1 सितम्बर, 1955 को ‘गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा’, राजघाट, नई दिल्ली की स्थापना की। उन्होंने गांधी प्रणीत भाषा-नीति के राष्ट्रीय भावनात्मक एकता की प्राप्ति के लिए भारतीय भाषाओं में निहित भाषिक, साहित्यिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक बिन्दुओं के समन्वितस्वरों के संरक्षण, संवर्धन तथा प्रचार-प्रसारका लक्ष्य संस्था को दिया। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सभा द्वारा पिछले सत्तरवर्षों में अनेक प्रकार के कार्यक्रम संचालित किए गए।

















