वर्तमान में सभा द्वारा निम्नप्रदत्त प्रमुख गतिविधियां संचालित की जा रही हैं:-
1.भारतीय भाषा समन्वय हेतु अकादमिक प्रवृतियां
(क) भारतीय भाषा पुस्तकालय- सन्निधि को अपने समृद्ध पुस्तकालय पर गर्व है। यहाँ 30,000 से अधिक प्राचीन व नवीन मूल्यवान पुस्तकें हैं। यहाँ पूरे भारत और विश्व की अनेक भाषाओं की दुर्लभ पुस्तकें उपलब्ध हैं।
(ख) भारतीय भाषा अध्ययन केन्द्र-राष्ट्रीय भावात्मक एकता हेतु भारतीय भाषाओं का संरक्षण एवं संवर्धन अति आवश्यक है, इसी उद्देश्य से संस्था में विभिन्न भाषाओं को सिखाने का कार्य निरंतर चल रहा है। जिसके अंतर्गत गुजराती, मराठी, उर्दू, संस्कृत, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, हिन्दी, पंजाबी, मलयालम, बोडो आदि भाषाओं के सर्टिफिकेट कोर्स एवं डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित होते हैं।
(ग) भारतीय भाषा, साहित्य-संस्कृति तथा गांधी-दर्शन विषयक-विचार गोष्ठी, कार्यशाला, भाषणमाला एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजन। भारतीय भाषाओं (विशेषरुप से आदिवासी) से सम्बद्ध विषयों पर सभा देशभर में अकादमिक प्रवृत्तियों का आयोजन करती है। सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य में समन्वित भारतीय संस्कृति प्रवाहमान है। उसके मुख्य पक्षों को उजागर करने के लिए भी विविध कार्यक्रम संयोजित किए जाते हैं। विगत कई दशकों में गैर-अनुसूचित भाषाओं, आदिवासी समाज के भाषिक, साहित्यिक संदर्भों पर अनेक राष्ट्रीय सम्मेलन, सेमिनार आयोजित किए गए हैं। गांधी-विचार की वर्तमान संदर्भों में अपरिहार्यता को स्थापित करने के लिए विशिष्ट व्याख्यान-माला आयोजित की जाती है। पू. श्री काकासाहेब की पुण्यतिथि 21 अगस्त पर आयोजित स्मारक व्याख्यान उल्लेखनीय है। नई दिल्ली, राजस्थान एवं असम में अनेक गांधी विचार पर आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
(घ) सन्निधि संगोष्ठी (मासिक, हिन्दी साहित्य पर आधारित)-गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्त्वावधान में सन्निधि संगोष्ठी हर महीने होती है। यह हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं के रचनाकारों को मंच देने और प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकारों के साहित्य से उन्हें अवगत कराने के मकसद से शुरू किया गया अभियान है। नये रचनाकारों को मार्गदर्शन हेतु और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिये प्रसिद्ध साहित्यकारों को भी आमंत्रित किया जाता है।
(ड) बोडो अध्ययन केन्द्र (पूर्वोत्तर भारत की बोडो सहित आदिवासी भाषा साहित्य-संस्कृति संवर्धन हेतु। )
पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण के लिए गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा पिछले 25 वर्षों में अनेक अकादमिक अनुष्ठानों का आयोजन करती रही है। इस कार्य को व्यवस्थित करने के लिए वर्ष 2024-2025 में बोडो अध्ययन केन्द्र की स्थापना की गई है। यह केन्द्र असम विशेषरूप से बोडोलैण्ड के सरकारी, सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संगठनों के सहयोग से कार्य करता है। अभी बोडो साहित्य सभा, अखिल बोडो छात्र संघ के पदाधिकारी इसके परामर्शदातृ मण्डल में हैं।
दिनांक 16-17 नवम्बर 2024 को बोडोलैण्ड महोत्सव का इंदिरा गांधी स्टेडियम में बृहद् आयोजन हुआ। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के सान्निध्य में छः हजार से अधिक असमवासियों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया।
दिनांक 29-30 मार्च, 2025 में दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन हुआ। जिसमें बर्मन कछारी, बर्मन मंदाई, भोजपुरी, गारों, गोर्खा, हजोंग, कोच राजबंग्शी, कुरूख (ओरांव), मदही कछारी, मुण्डा, राभा, संताल, सदरिया कछारी, बंगाली एवं बोडो भाषाओं के भाषाविद, साहित्यकार एवं संस्कृतिकर्मी 100 से अधिक संख्या में उपस्थित थे। सम्मेलन का विषय था, ‘‘बोडोलैण्ड की विभिन्न जातियों के भाषिक एवं सांस्कृतिक मुद्दे’। बोडोलैण्ड क्षेत्रीय परिषद (बी टी सी) के चीफ श्री प्रमोद बोडो, बी.टी.सी. के स्पीकर श्री कातिराम बोड़ो, लोकसभा सांसद श्री जयन्त बसुमतारी, राज्यसभा सांसद श्री आर. नार्जीरी, सभा की सभापति कुसुम शाह, बोडो साहित्य सभा के सभापति प्रो. सूरत नार्जारी, आब्सू के सलाहकार, प्रो. अब्दुल अलीम, प्रो. शोभा सत्यनाथ एवं प्रो. टी.एस. सत्यनाथ इत्यादि उपस्थित थे।
बोडो अध्ययन केन्द्र के संयोजक प्रो. रमेश भारद्वाज ने कार्यशाला का संयोजन किया। कार्यशाला के द्वारा पारित निर्णयों के अनुसार मई-जून 2025 में विशेषज्ञों के साथ असम में अलग-अलग संगठनों के साथ बैठक आयोजित की जाएगी।
दिनांक 6-7 सितम्बर, 2025 को बोडो साहित्य सभा, असम तथा आब्सु के सहयोग से गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा द्वारा संचालित ‘बोडो अध्ययन केन्द्र’ के द्वारा बरपेटा रोड, असम में कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें असम के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के 12 प्राध्यापकों ने बोडो भाषा को ऑफलाइन/ऑनलाइन व्यवस्था द्वारा सीखाने के लिए पाठ्यक्रम निर्धारण तथा पुस्तक निर्माण का कार्य किया।
कार्यशाला का उद्घाटन बोडो साहित्य सभा के सभापति प्रो. सूरत नार्जारी तथा आब्सु के अध्यक्ष श्री दीपेन बोडो ने किया तथा बोडो साहित्य सभा के महामंत्री श्री नीलकांत गयारी ने दोनों दिन कार्यशाला का संचालन किया। कार्यशाला में प्रोफेसरों के साथ पद्मश्री प्रो. अनिल बोडो, गौहाटी विश्वविद्यालय की उपस्थिति विशिष्ट थी।
(छ)विदेशी भाषा अध्ययन केन्द्र- यहाँ पर बहुत वर्षों से कई विदेशी भाषाएँ जैसे अरबी, फारसी, जापानी भी पढ़ाई जाती हैं। यह एक वर्ष का डिप्लोमा कोर्स होता है।
2. साहित्य-प्रकाशन
(क) साहित्य प्रकाशन-सभा द्वारा भारतीय भाषाओं (आदिवासी सहित) एवं उनके साहित्य से सम्बद्ध तथा गांधी विचार की पुस्तकें विभिन्न भाषाओं में जैसे कि हिन्दी, उर्दू, गुजराती, मराठी, अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं में तैयार की जाती हैं और प्रकाशित की जाती हैं। संस्था के स्थापना काल से लेकर वर्तमान तक दो सौ से अधिक ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं।
(ख) गांधी साहित्य भंडार- सभा द्वारा गांधी समाधि, राजघाट पर 60 वर्षों तक ‘गांधी साहित्य भण्डार’ का संचालन किया गया। जिसमें गांधी विचार एवं राष्ट्रीय साहित्य की प्रदर्शनी एवं बिक्री होती थी। वर्तमान में यह प्रवृत्ति संस्था के सभागार के बाहरी कक्ष से संचालित होती है।
(ग) मंगल प्रभात- यह संस्था की मासिक पत्रिका है। इस पत्रिका का पहला अंक 26 जनवरी, 1950 में प्रकाशित हुआ था। प्रारंभ के 30 वर्षों तक आचार्य काकासाहेब कालेलकर इसके संपादक रहे। भारतीय भाषाओं की समन्वय-संस्कृति के संवर्धन को समर्पित यह पत्रिका विगत 75 वर्षों से अनवरत प्रकाशित हो रही है।
3. सांस्कृतिक गतिविधियां
(क) मीनाक्षी माथुर मेमोरियल संगीत केन्द्र-गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा शास्त्रीय गायन एवं नृत्य की कक्षाएँ चलाती है। ये कक्षाएँ प्रयाग संगीत समिति से अनुबंधित हैं। प्रतिवर्ष करीब 500 से 800 छात्र-छात्राएं इस प्रवृत्ति से लाभान्वित होते हैं।
(ख) नवोदित कलाकार समिति- शास्त्रीय संगीत के नए कलाकारों को मंच देने के मकसद से प्रत्येक महीने के अंतिम शनिवार को संगीत संध्या का आयोजन किया जाता है। बहुत से प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतज्ञ इस कार्यक्रम में भाग लेते हैं। अनेक वर्षों से यह प्रवृत्ति अबाधित चल रही है। अनेक कलाकारों को सम्मानित भी किया जाता है। वर्ष में एक बार दो दिन बड़े हाॅल में वार्षिक संगीत समारोह आयोजित होता है।
(ग). नाट्य कला मंडली- गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा की नाट्य कला मंडली देश की विविध साहित्यिक कला कृतियों को रंगमंच एवं अन्य प्रदर्शनकारी कला माध्यमों में अभिव्यक्त करने के लिए नियमित रूप से प्रयोगशील है।
नाट्य कला मंडली से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के व्यवसायिक प्रशिक्षण प्राप्त कई कलाकार सक्रिय रूप से संबंध हैं और अपने रचनात्मक कार्यों से संस्था में हिन्दुस्तानी साहित्य की कृतियों का विशिष्ट मंचन करते रहते हैं।
4. रचनात्मक कार्यक्रम
संस्था के आस-पास के जन-समुदाय के लाभार्थ कोरोना काल से पहले बालवाड़ी, सिलाई-प्रशिक्षण, कम्प्यूटर प्रशिक्षण, टाईपिंग प्रशिक्षण आदि अनेक प्रवृत्तियां चलती थी। वर्तमान में संचालित गतिविधियां इस प्रकार हैं :-
(क) चरखा प्रशिक्षण एवं खादी विनियम केन्द्र-गांधीजी राष्ट्र निर्माण के केन्द्र में चरखे को सूर्य कहते थे। संस्था केवल कातना ही नहीं सिखाती, बल्कि काते गए सूत के बदले कपड़े, खादी या जीवन उपयोगी अन्य वस्तुएँ जैसे कि दालें, चावल, साबुन, गेहूँ, कॉपीआदि भी उपलब्ध कराती है। इस केन्द्र द्वारा 15 से भी अधिक देशों के हजारों प्रतिनिधियों ने कताई सीखी है।
(ख) गांधी समाधि पर चर्खा-कताई यज्ञ- 2 अक्टूबर और 30 जनवरी को गांधी समाधि पर अखण्ड कताई-यज्ञ का आयोजन संस्था द्वारा नियमित रूप से होता है।
(ग) गांधी विचार पर विद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर प्रतियोगिता आयोजन-गांधी विचार को विधार्थियों तक पहुँचाने के लिए विद्यालय एवं विश्वविद्यालय के विधार्थियों के बीच विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। जैसे निबन्ध-लेखन प्रतियोगिता, देशभक्ति गीत प्रतियोगिता, चित्रकला प्रतियोगिता एवं भाषण प्रतियोगिता आदि।
5. सर्वधर्म-समन्वय
(क) सर्वधर्म समन्वय प्रार्थना- संस्था में प्रतिदिन सुबह सात बजे गांधीप्रणीत सर्वधर्म-समन्वय प्रार्थना होती है। संस्था के सभी सदस्य एवं अतिथि इस प्रार्थना सभा में भाग लेते हैं। कभी-कभी किसी प्रबुद्ध व्यक्ति के वक्तव्य का भी आयोजन होता है।
(ख) सर्वधर्म उत्सव आयोजन- विभिन्न धार्मिक त्यौहारों पर विशेष प्रार्थना, संगोष्ठी या परिचर्चा का आयोजन किया जाता है। निबन्ध या अन्य प्रतियोगिता जैसे कि रामचरितमानस, गीता और गुरुग्रन्थ-साहिब के शबद गायन प्रतियोगिता आयोजित की जाती है गांधी विचार के अनुसार धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए यह विशिष्ट प्रवृत्ति है।
(ग) आचार्य काकासाहेब कालेलकर विश्व समन्वय पुरस्कार-संस्था द्वारा यह पुरस्कार किसी ऐसे व्यक्ति या संगठन को दिया जाता है, जिसने विभिन्न धर्म-सम्प्रदायों, समुदायों, जातियों एवं संस्कृतियों के बीच समन्वय स्थापित करने में अहम् भूमिका निभाई हो। यह पुरस्कार काका कालेलकर सर्वोदय सेवा ट्रस्ट के संयुक्त तत्त्वावधान में दिया जाता है। (1)श्रीमती फातिमा मीर, (दक्षिण अफ्रिका) (2)श्री के. ओकामोतो (जापान), (3) फादर वालेस (स्पेन) (4) डाॅ. लोकेश चंद्र, (5) एडवोकेट श्री इन्द्रजीत, (6) श्री मंगतराम सिंघल, (7) श्री वीरेन्द्र प्रभाकर को इस पुरस्कार से अभी तक सम्मानित किया जा चुका है।
(घ) प्रदर्शनी- समय-समय पर भारत के विभिन्न स्थानों पर आचार्य काकासाहेब कालेलकर की चित्र-प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। काकासाहेब की जन्म शताब्दी एवं 125वीं जयंती पर पूरे देश में कई स्थानों पर प्रदर्शनी लगाई गई। 1, दिसम्बर और 21 अगस्त को प्रतिवर्ष प्रदर्शनी लगाई जाती है।
6. आचार्य काकासाहेब कालेलकर स्मारक संग्रहालय
संस्था के संस्थापक काकासाहेब के सौवें साल पर एक छोटे संग्रहालय का उद्घाटन तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा द्वारा किया गया था। इस संग्रहालय में काकासाहेब द्वारा प्रयोग की गई सभी वस्तुएँ रखी गई हैं।
7. हमारी सहयोगी संस्थाएं
सभा के संस्थापक अध्यक्ष आचार्य काकासाहेब कालेलकर की जन्मशती में उनकी स्मृति में सभा के दो ग्राम विकास केन्द्र ‘आचार्य काकासाहेब कालेलकर लोकसेवा केन्द्र ’ के नाम से स्थापित किए गए। पहले 20 वर्षों तक ये केन्द्र मुख्य सभा की शाखा के रूप में कार्यरत थे। वर्तमान में स्वतंत्र संस्था के रूप में कार्य कर रहे हैं।
(1) आचार्य काकासाहेब कालेलकर लोकसेवा केन्द्र, नन्दुरबार (महाराष्ट्र) जिसकी निम्नलिखित गतिविधियाँ हैं:-
(क) बालवाड़ी (क्रेच)-महाराष्ट्र में नन्दुरबार जिले के गाँवों में केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड के आर्थिक सहयोग से 16 क्रेच तथा नूतन बाल मंदिर संचालित होते थे। इसकी शुरुआत 1990 में हुई थी। इसमें उन माताओं के बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं, जो घर से बाहर या खेतों में काम करती हैं।
(ख) सिलाई केन्द्र-आचार्य काकासाहेब कालेलकर नन्दुरबार महाराष्ट्र द्वारा विभिन्न जगहों पर सिलाई केन्द्र चलाए जाते थे।
(ग) बाल-पुस्तकालय-बच्चों के ज्ञानार्जन हेतु बाल साहित्य हिंदी, मराठी, गुजराती, अंग्रजी में रखा गया है। स्थानिक छात्र-छात्राएँ पुस्तकालय का लाभ उठाते हैं।
(घ) कताई कक्षा और खादी केन्द्र-हमारे केन्द्र नंदुरबार में चरखा कताई और खादी का काम बहुत अच्छा चला।
(ड) कालेलकर कंप्यूटर केन्द्र-इस केन्द्र पर विद्यार्थी कंप्यूटर का आधारभूत ज्ञान पाते हैं। इसके अलावा वे डी.टी.पी., अकाउन्ट आदि भी सीखते हैं।
फरवरी 2012 में एडवोकेट श्री रमन भाई शाह, एडवोकेट श्री केतन शाह ने आचार्य काका कालेलकर लोक सेवा केन्द्र के स्थायी भवन के लिए एक-एकड़ जमीन दान की है। इस केन्द्र की योजना काकासाहेब कालेलकर के समन्वय संदेश को समाज में गांधी के रचनात्मक कार्यों द्वारा फैलाना है।
(च) चंद्रिबा समन्वय निकेतन‘ 8 दिसम्बर, 2013 को नारायणपुर जिला नंदुरबार (महाराष्ट्र) में आचार्य काकासाहेब कालेलकर लोक सेवा केन्द्र के अंतर्गत चंद्रिबा समन्वय निकेतन का उद्घाटन किया गया। वहाँ सौ वृक्ष लगाये गये हैं। बाल कल्याण तथा महिला विकास की प्रवृत्तियाँ चल रही हैं।
(2) आचार्य काकासाहेब कालेलकर लोक सेवा केन्द्र, बड़गाँव, जिला बूंदी (राजस्थान)
इस केन्द्र की स्थापना सन् 1997 में हुई थी। जिसका उद्घाटन तत्कालीन सांसद एवं पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी ने किया था।
केन्द्र के स्थायी परिसर के लिए, पाँच-एकड़ जमीन दान में मिली है। इस केन्द्र की योजना काकासाहेब कालेलकर के समन्वय संदेश को समाज में गांधी के रचनात्मक कार्यों द्वारा फैलाना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वैद्यजी परिवार ने अपने भाई स्वर्गीय श्री भाना राम जी की पुण्यस्मृति में यह जमीन वर्ष 1997 में दान में दी थी।
(क) गौशाला – जिसमें 3 आर.सी.सी के पक्के शेड, तीन टीन की छत वाले पक्के शेड, दो कमरे का अतिथि गृह, कार्यालय कक्ष, तीन गौसेवक घर, 2 बडे स्टोर रूम, दो विशाल पक्के चारा स्टोर निर्मित हैं। पूरे परिसर की चारदिवारी भी पक्की बनी है।तीन सौ से अधिक बूढ़ी बीमार और आश्रय रहित गायों को यहाँ पर आश्रय दिया गया है। जिनके लिए चारे, आश्रय एवं इलाज का भी प्रबन्ध किया गया है। प्रतिमास गौशाला एवं आसपास के किसानों के पशुओं के लिए मेडिकल कैंप भी लगाए जाते हैं।
(ख) वाटर शेड प्रोजेक्ट- भारत सरकार द्वारा संचालित कपार्ट तथा स्थानीय लोगों के सहयोग से गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा ने राजस्थान में बूँदी जिले के बड़गाँव में वाटर शेड डिवलपमेंट की योजना सफलतापूर्वक क्रियान्वित की है। इस योजना की शुरुआत वर्ष 2000 में की गई और वर्ष 2011 में पूरी हुई। इसके निर्माण में कुल व्यय रुपये 83,03,264 हुए (65,06,767, अनुदान मिला एवं 17,96,496 रुपये अन्य दान द्वारा सहयोग मिला), इसके माध्यम से कुल 2033 हेक्टेयर क्षेत्र कंक्रीट और मिट्टी से बनी संरचना द्वारा विकसित किया गया है।
(ग) विचार गोष्ठी- विधार्थियों एवं महिलाओं के प्रबोधन हेतु साल में दो बार विचारगोष्ठी भी आयोजित होती है।






















